इमरान प्रतापगढ़ी  । विरोधियो ने हमेशा उस पर इल्जाम लगाया की वो मज़लूमों की लाश पर आपने मुशायरे का मंच सजाकर चंद सिक्कों की खातिर कसीदे पढ़ने जाता है। लोगों ने हमेशा उस पर लांछन लगाया की वो महज़ एक शायर है जो कौम की नुमाइन्दगी का ढोंग करके अपने मुशायरों की मार्केटिंग करता फिरता है।
JNU के छात्रों के बीच
जब देश में लिंचिंग की शुरुआत हुई तब उसने अख़लाक़ से लेकर तबरेज़ अंसारी तक़ के लिये अपने मुशायरों के मंचों को लिंचिंग पीड़ितों की आवाज़ उठाने का मंच बनाने की कोशिश की पर तब भी लोगों ने उसमें उसका स्वार्थ ढूंढ लिया। उसने लिंचिंग के विरोध में देश में सबसे पहले दो राष्ट्रव्यापी जनआंदोलन “ईद विद ब्लैक बैंड” “और लहू बोल रहा है” का आव्हान किया पर इसमें भी लोगों ने उसका मतलब तलाशने की बेजा कोशिशें की।
लिंचिंग के शिकार पहलू खान की मां के साथ इमरान
उसने राजनीति के मैदान में कदम रखा ताकि इस देश में उस तबके की आवाज़ बना जा सके जिसकी कोई नहीं सुनता पर उसे नकार दिया गया की चुनने वालों की राजनीतिक समझ बस इतनी ही थी की गूंगा स्थानीय चुन लेंगे पर पूरी दुनिया में गूंजने वाला बाहरी नहीं चुनना। वो अलग बात थी की वो भले ही उनके शहर का ना था पर उनके अपने ही सूबे का था।
मुरादाबाद में रोड शो के दौरान इमरान प्रतापगढ़ी
पर सलाम कीजिए उसकी साबित-कदमी को की तमाम दुश्वारियों, बुराईयों, गालियों और तथाकथित विरोध की आवाज़ों ने मिलकर भी उसकी हिम्मत का एक बाल भी बाँका नहीं किया, तमाम साज़िशों ने मिलकर भी उसके अंदर से कौम के दर्द को कभी रत्ती भर भी कम नहीं किया। और पूरे देश ने देखा की जब उसने अपने पूर्व नियोजित तमाम कार्यक्रमों पर देश और दिल्ली के छात्रों और आवाम के संविधान बचाओ आंदोलन को किस गजब के सलीके के साथ प्राथमिकता दी।
जामिया छात्रों पर पुलिस बर्बरता के खिलाफ़ इंडिया गेट पर
की जब उसे किसी अंतर्राष्ट्रीय मुशायरे के सफ़र पर होना था तब वो दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर पुलिस बैरीकेड पर तिरंगा लिये खड़ा दिल्ली के तमाम आंदोलनरत साथियों के साथ जामिया के छात्रों के हक़ के लिये नारे लगा रहा था। की जब उसे क़तर मुशायरे के सिलसिले में किसी दूसरे शहर में होना था तब वो इंडिया गेट पर पालथी मारे आवाम के साथ धरने पर बैठा हुआ था। की जब उसे किसी लग्ज़री होटल के किसी आलीशान रूम में चैन की नींद सोना था तब वो दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में शाहीन बाग के आंदोलनकारियों के बीच खड़ा उनकी आवाज़ में आवाज़ मिला रहा था।
भोपाल में आवाम के बीच
की वो सुबह तड़के सफ़र करके दोपहर में भोपाल के आंदोलन कि हिस्सा बनता तो रात को JNU में खड़ा हिटलर के काले कानून का विरोध कर रहा होता। शाम को जंतर-मंतर पर लोगों की आवाज़ में आवाज़ मिलाने पहुंच जाता तो रात होते ही इंडिया गेट या ITO पर मौजूद होता । की जब संविधान बचाने की बात आई तब उसने रेख्ता के किसी मंच पर शायरी सुनाने के बजाय बापू की समाधि पर सत्याग्रह कर रहे लोगों के बीच संविधान की प्रस्तावना पढ़कर सुनाने का रास्ता चुना। की जब गोडसे वालों ने आंदोलनों को कुचलने के लिये गोरों का हथकंडा अपनाया तब वो गांधी के साथ खड़ा नज़र आया आंदोलनरत लोगों के साथ नज़र आया। 24 घंटे और आठों पहर नज़र आया।
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