एक भारतीय नागरिक का दर्द 
और कितना दर्द अब  दोगे साहब
 सीना छलनी क्या कर दोगे साहब 
नोटबंदी ने हमारी कमर तोड़ डाली 
एक तो महंगाई की मार दिन रात मारती है 
ऊपर से कुछ जीएसटी ले जाती है
अब तो यहां नौकरी भी दिन-रात जाती हैं
 हर एक के अंदर एक खौफ नजर आता है 
हर एक का अब बुरा दिन नजर आता है
कहां कोई अब यहां चैन से सो पाता है
अंधे गूंगे बहरों को यहां कलम पकड़ा दिया जाता है पढ़े-लिखे युवाओं को पकोड़ा तलने का व्यापार किया जाता है
 कौन किसकी यहां सुनता है
 हर शख्स जुबा पर फरियाद लिए रहता है
हरा भरा देश हुआ बंजर अब कहां किसी को कुछ दिखता है
फुटपाथ की दुकानें भी तोड़ दी जाती है अब पकौड़ा भी कहां तलने की जगह दी जाती है
आश्वासन की है सरकारी आश्वासन दिए जाती है
 एक तरफ शिक्षा आसमान छुए जाती है
 दूसरी ओर इनकम दिन रात घटती जाती है
बीमारी में लाखों कि बिल अस्पताल में बढ़ती जाती है
इनकी इनकम पर नहीं सेंधमारी जाती है
खर्च दिन-रात बढ़ रहा है 
और इनकम दिन रात घट रही है
घर के मुखिया पर क्या दिन रात बीत रही
अपनों के बीच मुस्कुराता है 
तनहाई में आंसू बहाता है
 जितनी कमाई नहीं 
उतने की अब प्याज हो जाती है
दाल भी अब सोने के भाव जाती हैं 
दाल रोटी से हो गुजारा कहां अब हो पाता है
 सब्जियां भी यहां आसमान छू जाती हैं
 एक इनकम है हमारी जिस पर रात दिन सेंधमारी जाती है 
महंगाई हमारी बीमारी बनती जाती है बेरोजगारी हमें पल-पल मारती दी जाती है
✍✍ शबा खान
इंडियन केयर सोशल फाउंडेशन डायरेक्टर 
(राष्ट्रीय एकता मिशन )
उत्तर प्रदेश जनरल सेक्रेटरी
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