सूनी और वीरान सड़के, भयावह लगते मोहल्ले, 130 करोड़ की डरी-सहमी आबादी तक़रीबन घरों में कैद। इसी बीच कही भूख और आश्रय के अभाव में रोते-बिलखते बच्चे और परिवार के साथ भटकते लोग। शंका और असुरक्षा के कारण गाँव-घर जाने की जिद्द। सचमुच संकट के समय गाँव-घर और परिवार की याद आती है। भारत 130 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला महज एक देश या धरती नही है, बल्कि ये विश्व की वह पावन भूमि है, जहाँ स्वस्थ विचार, पवित्र संस्कार और मनमोहक परम्परा इसे अग्रणी और जीवंत बनाती है। हिमालय से निकली आध्यात्मिक अनुभूति एवं ऋषि मुनियों की तपस्या से उत्पन्न ऊर्जावान शक्ति एवं संस्कृति इसे विश्व गुरु के पद पर बैठाती है, और बार-बार संकट के समय विश्व की निगाहें भारत पर टिक जाती है। अतः जरुरत है, अतीत के पन्नों को पलटने की। अभी भी बहुतों को याद होगा, गाँव में बनी मट्टी की दीवारों के घर, खपड़ा-नारिया ब मट्टी और लकड़ी से बनी छत। हर त्यौहार या शुभ अवसर पर गाय के गोबर, मूत्र और पानी से आँगन और दीवाल की पुताई। यह सब करने में एक अजीब उत्साह और ऊर्जा का संचार। किसी भी तरह के वायरस के खत्म होने की गारंटी। पूरी तरह वायरस/जर्म्स मुक्त, सर्दी में गर्मी और गर्मी में सर्दी। लेकिन आज खूबसूरत और बड़े भवनों को वायरस/जर्म्स मुक्त बनाया जा रहा हैं, जबकि हम इसे पहले से जानते थे। हमारी संस्कृति में पहले सात समंदर पार जाने की मनाही थी। यहाँ तक कि अपनी सीमा भी लोग पार नही करते थे। पूर्वज जानते थे भारत के मौसम, परम्परा, संस्कृति के साथ जो जीवन शैली हमने विकसित की है, वह अन्य के सम्पर्क में आने पर दूषित और घातक होगी। आज हम अंतरराष्ट्रीय उड़ाने बंद कर चुके है। कहते हैं, पुरानी हर चीज़ बुरी नही होती और नई हर चीज़ अच्छी नही। लेकिन हमने अपने प्राचीन हर अच्छे संस्कार और विचार का नाकि मज़ाक उड़ाया, बल्कि तिरस्कार भी किया। इसका फायदा उठाने के लिए एक वर्ग तैयार भी बैठा था, जिसने लोगों को जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि में बांटकर सत्ता की लूट खसोट की, आज वे भी डरे सहमें हैं। हम गंगा, यमुना, पर्वत, वृक्ष आदि की पूजा करते थे। इन्हे पवित्र मानकर इनकी रक्षा करते थे, लेकिन महज एक आर्थिक वयवस्था के समर्थक एक वर्ग ने इसे भी नष्ट कर दिया। योग और त्याग की भूमि को रोग और अय्यासी से ग्रसित कर दिया। हमारे वैध (जो सम्पूर्णता में इलाज करते थे), हमारी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी, योग, ध्यान सबको समाप्त कर महेंगे अंग्रेजी उपचार को लाद दिया गया। पाँच तत्व से बने शरीर को महज एक तत्व के आधार पर इलाज एक लाभ तो देता है, लेकिन बदले में अन्य कई बीमारियां भी देता है। अब भी समय है सम्भलने और सोचने का,  कोरोना जैसे वायरस भविष्य में भी प्रकट किए जायेंगे, और इन्ही के सहारे आर्थिक युद्ध लड़े जायेंगे। ध्यान रहे वर्तमान का खतरनाक कोरोना आपदा आर्थिक वर्चस्व की लड़ाई का परिणाम हैं, जो आगे भी जारी रहेगा।

विचार प्रस्तुति
पुनीत गोस्वामी (मीडिया सलाहकार - उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद)
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