गागलहेड़ी नौशाद अली/ श्रीकांत शर्मा। जीएसटी से बचने के लिए स्टेशनरी विक्रेता अभिभावकों को पक्का बिल नहीं दे रहे हैं। जब अभिभावक उनसे पक्का बिल देने को कहते हैं, तो वह कुल स्टेशनरी की दर में जीएसटी भी जोड़ने की बात कहकर अभिभावकों को डरा देते हैं। इससे उन्हें लगता है कि यदि वह पक्का बिल लेंगे, तो अधिक पैसे चुकाने पड़ेंगे।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रांतीय महामंत्री भारत तिब्बत सहयोग मंच के नितिन राजपाल शर्मा ने कहा कि जहा एक ओर कोरोना जैसी महामारी से देश को बड़ी हानि पहुँच रही है। इस महामारी में ना जाने कितने घर बेरोजगार हो चुके है। 
नितिन राजपाल शर्मा ने बताया कि प्राइवेट स्कूल समन्धित एक अभियान चलाया जा रहा है, जिसमे की बच्चो को मिलने वाली किताबों का उनके अभिभावकों को मिल ना मिलना अगर दिया भी जाता है, तो खाली कोरे कागज पर दे दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि में सभी अभिभावकों से अपील करता हु की वह अपने बच्चो की किताबें खरीदते समय दुकानदार से उसका पक्का बिल जरूर ले। आप यह मत सोचे कि पक्का मिलने से किताबो में पैसे डबल हो जाए ऐसा नही है।
आपको बता दे कि वह स्टेशनरी का दाम पहले ही मूल्य से कई गुना अधिक चुका रहे हैं, जोकि नियम विरुद्ध है। इन दिनों पब्लिक स्कूलों में दाखिले की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में जाहिर है कि बच्चों की अगली कक्षा के लिए अभिभावक स्टेशनरी, नोटबुक, किताबें व यूनिफार्म आदि खरीद रहे हैं। पिछले 10 दिनों से किताबें और स्टेशनरी की दुकान पर भीड़ नजर आ रही है।
आपको बता दे कई जगह पर लाइन लगाकर किताबें और स्टेशनरी बेची जा रही है। वाणिज्य कर विभाग के अधिकारियों की मानें, तो किताबें टैक्स फ्री हैं। उन पर कोई टैक्स लागू नहीं होता है, लेकिन स्टेशनरी और अन्य सामान पर अलग-अलग टैक्स निर्धारित हैं। नियमानुसार दुकानदारों को स्टेशनरी का पक्का बिल ग्राहक को देना चाहिए। मगर वह कच्चा बिल ही थमा रहे हैं। ऐसे में मनमाने दाम वसूल कर अपनी जेब भर रहे हैं। देहात क्षेत्र के तमाम पुस्तक विक्रेताओं की स्थिति यही है। पक्का बिल न देने के पीछे हकीकत यह भी है कि कई पब्लिक स्कूलों ने दुकानदारों को किताबें और स्टेशनरी बेचने का ठेका दे रखा है।
नितिन शर्मा ने यह भी कहा कि बाहर से किताबें और स्टेशनरी का आयात स्कूल द्वारा होता है। सिरदर्द से बचने के लिए अनेक स्कूलों ने कमीशन बेस पर किताबें और स्टेशनरी बेचने का ठेका दुकानदारों को दिया हुआ है। यही वजह है कि दुकानदार पक्का बिल नहीं दे रहे हैं। कई स्कूल तो अपने यहां से किताबें और स्टेशनरी बेच रहे हैं 
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