रिपोर्ट ब्रह्मानंद चौधरी ब्यूरो चीफ हरिद्वार
9410563684


                               रुड़की निवासी समाजसेवी प्रवीण अरोड़ा ने भारत के महामहिम राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक ज्ञापन भेजकर बताया कि जबसे देश में लॉकडाउन लगा हैं। इंसान को शोषणकर्ता ही पाया। चाहे ताकतवर कमजोर का करें, या पैसेवाला मजदूर का। किसान जमीन का, व्यापारी ग्राहक का। सबसे बड़ी बात यह है कि सारे बुद्धिमान लोग मिलकर प्रकृति माता का शोषण कर रहे हैं। वैज्ञानिक कह रहे है कि कोरोना नामक वायरस हैं, यह रोज नया रुप बदल रहा हैं। यह रोग जीव को कैसे जकड़ेगा, इसकी कोई वैक्सीन बनायेगा। पैसे लगाकर भी यह गारंटी नहीं कि यह वैक्सीन बदलते कोरोना को कंट्रोल कर लें। क्या प्रकृति से लड़ा जा सकता हैं, इतनी शक्ति, न ज्ञान, न हिम्मत किसी में नहीं हैं। वैज्ञानिक भाई कह रहे हैं कि यह चीन का जैविक हथियार हैं। पाषणकाल मंे शिकारी अपनी पूर्ति के लिए जीव हत्या कर उसका भक्षण करते थे। हम सभ्यता के परिवेश में आये, खेती हर हो गये, धरती का सीना चीरा, हल चलाया, जहर खिलाया और प्रकृति ने हम सबको लाल ही समझा। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रकृति की गोद से कोयला, हीरे, पन्ने, सोना-चांदी मिले, लोहा मिला, पत्थर मिले, इन्हें खोदकर गगनचुंबी करोड़ों टन वजन एक ही जगह दबाव बना दिया। सबमर्शिबल बोर्ड से अंधाधुंध पानी सतह पर बर्बाद करने का चलन चल रहा हैं। इसके कारण धरती की परत और जल की सतह में रिक्ता आई। जब भी कोई बड़ा भूकंप आयेगा, इन बड़ी इमारतों को नेस्तनाबूद कर देगा। 60 दिन के लॉकडाउन में वायुण्डल साफ, गंगा-नदियों में स्वयं ही स्वच्छता का बदलावा आया, अरबों खर्च कर जो हम नहीं पा सके, वह निःशुल्क मिल गया। प्रकृति ने अब यह तरीका अपनाया है हम सबको समझाने के लिए। जब प्रकृति पचास साल की गंदगी को 15 दिन में साफ करने में समर्थ हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि रविवार को लॉकडाउन किया जाये, जो जहां हैं, वह घर मंे रहे, केवल चिकित्सा सेवा और दुर्घटनाओं से बचाव वाली सेवा सुचारू रहे। मतलब हर साल 15 दिन केवल प्रकृतत के नाम के होने चाहिए। पिफर देखो खुशहाली आयेगी।
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