आतंकवादियों का हिमायती हरगिज भी मुसलमान कहलाने का हक़दार नहीं: साबरी

ईश्वर के दूत (पैगम्बर) मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वआलिही वसल्लम के हक़ीक़ी जानशीं मौला ए क़ायनात हज़रत अली इब्ने अबु तालिब अलैहिस्सलाम जिसको ख़ुदा ने अपना हाथ कहा, चेहरा कहा ,और मुहम्मद साहब ने कहा कि अली का चेहरा देखने से अली का ज़िक्र करने से अली से मुहब्बत करने से ईश्वर की पूजा(इबादत) होती है, उसी अली इब्ने अबू तालिब अलैहिस्सलाम को ईश्वर के आवास(मस्जिद) में पूजा(इबादत) करते हुए एक मुसलमान अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम नामी व्यक्ति ने शहीद कर दिया।
आज चोदह सौ साल गुज़र जाने के बाद भी मानवता के मानने वाले बहुत बड़ी संख्या में इस आशंका मे हैं कि एक तरफ़ रहमतुल्लिलआलमीन और उनके रहमती जानशीन मौला अली इब्ने अबू तालिब अलैहिस्सलाम मुसलमान ही नहीं बल्कि मुसलमानों के रसूल के बाद सबसे बड़े और रसूल जैसे रहनुमा,
इसके अलावा दूसरी ओर भी मुसलमानों की तरह नाम वाले मसलन रहमान,क़ुतामा,और इब्नेसुफयान जबकि ये मुसलमान भी नमाज़ी भी, हाजी भी, सब कुछ थे  अब इसको यक़ीन में लाना बहुत मुश्किल है कि इनमें सही मुसलमान कौन है?
क्योंकि मौला अली अलैहिस्सलाम को किसी हिन्दू भाई या सिख भाई या ईसाई भाई ने तो क़त्ल नहीं किया था।
क़ातिल भी अपनें को मुसलमान कहता है, मक़तूल तो मुसलमानों के ख़लीफा हैं, यानी मुसलमानों के ख़लीफा को कत्ल करने वाला भी मुसलमान ही है।
और इसके अलावा मस्जिद में क़त्ल और वह भी रोज़े की हालत में नमाज़ पढ़ते हुए ।
बड़े अफ़सोस की बात है। क्या इस वाकया की मज़म्मत नहीं की जाए?
जबकि मौला अली ने हमेशा ईस्लाम का असल प्रचार किया।
यहां तक कि  इस्लाम ने जंग में भी बच्चों,बुढ़ो, महिलाओं एवं निहत्थे पर हमले की इजाजत नहीं दी है बल्कि जानवरों पर भी रहम करने का हुक्म दिया हैं। यहां तक कि क़ुरबानी के जानवर को भी कुर्बानी से पहले पानी पिलाने और चारा खिलाने का हुक्म दिया।
जबकि मौला अली की पूरी जिन्दगी ग़रीब बेसहारा एवं मज़लूम लोगों की सेवा में गुज़री है। यहां तक कि जब इस ज़ालिम रहमान ने अली को रमज़ान की हालत में ज़ख्मी किया और शाम को इफ़्तार के लिए आपकी बेटी जनाब ज़ैनब सलाम.अ. खुजूर का शर्बत लेकर अपने बाबा अली के पास पहुंची तो मौला अली ने अपने बड़े बेटे इमाम हसन अलैहिस्सलाम के हाथो वह शर्बत अपने क़ातिल को भिजवा दिया।
 पास बैठे लोगों ने कहा मौला आप सुबह से रोज़े से हो, प्यासे हो, आप पी लिजीए ।
आपने फ़रमाया मेरा क़ातिल भी सुबह से भूखा प्यासा है।
आपके करीमाना व रहीमाना क़िरदार से पता चलता है कि इस्लाम का अस्ल मक़्सद सेवा करना हैं।
इन सारी बातों से पता चलता है कि ज़ालिम (आतंकवादी) रहमान हो या इब्नेसुफयान इनका ताल्लुक किसी भी धर्म से नहीं है। क्योंकि जो मस्जिदों, मन्दिरों,गुरुद्वारों, एवं गिरजाघरों में पूजा करने वालों पर हमले करते हैं। वह किसी भी नाम के हों पर धार्मिक नहीं हो सकते और जो ज़ालिमो (आतंकवादियों) की हिमायत करें या उनके मरने पर अफ़सोस एवं गाएबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़ें या मदरसों में उनकी तारीफ़ में किताबें पढ़ाएं या क्लासें चलाएं न जानें यह सब कुछ करके कुछ लोग देश को और देश के भोले भाले लोगों को कहां ले जाना चाहते हैं।
आज जब हम उस क़ातिल इब्ने मुलजिम और उसके हिमायती बादशाह के उपर लानत करते हैं तो कुछ मुसलमानों को बहुत ज़्यादा तकलीफ़ होती है ।
यह समझ नहीं आता कि ये कौन से मुसलमान हैं। कुछ लोग वह भी है जो हज़रत मुहम्मद सल्लाहु अलैहि वआलिही वसल्लम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम वाला रहमती इस्लाम यानी भूखे को खाना, प्यासे को पानी नंगे को कपड़ा देना ही अपना धर्म समझते हैं। ख़ानक़ाहों से तमाम बुजुर्गों ने यही काम किया लंगर एवं सबीले(प्याऊ) चलाए।

जय हिन्दी-हिन्दुस्तानी ,
जय भारत,
एम.अ.साबरी(अलीग.)
मेल-abbassabri512110@gmai.com
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