रिपोर्ट ब्रह्मानंद चौधरी ब्यूरो चीफ हरिद्वार
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                                योगेश राघव ने कहा है कि उत्तराखंड राज्य में ऐसे संस्थान /निगम/ प्रतिष्ठान भी हैं जिनमें समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है ऐसे मध्यवर्गीय परिवारों और अभिभावकों की स्थिति इस वैश्विक महामारी में अति दयनीय है इस कारण अभिभावकों को अपने परिवार का भरण पोषण के लिए कई विषम चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जिनमें प्रमुख हैं "स्कूल प्रबंधकों द्वारा ट्यूशन फीस के लिए अभिभावकों को बाध्य करना स्कूल प्रबंधन द्वारा लॉकडाउन के अंतर्गत दी जा रही ऑनलाइन शिक्षा (व्हाट्सएप के माध्यम से गत वर्ष के विद्यार्थियों की चेक की गई कॉपियों की फोटो खींचकर) दी जा रही है जो अभिभावकों और विद्यार्थियों के समझ से परे है और साथ ही साथ उसमें कई त्रुटियां भी हैं जिस पढ़ाई से सभी अभिभावक गण असंतुष्ट हैं । कोरोना काल से  पूर्व ट्यूशन फीस मैं स्कूल के सभी संसाधनों का प्रयोग हो रहा था परंतु शिक्षक द्वारा फोटो भेजने के उपरांत वर्तमान में घर के संसाधनों के द्वारा विद्यार्थी को अभिभावक द्वारा पढ़ाया जा रहा है इस प्रकार स्पष्ट है कि अपने बच्चों को घर पर पढ़ाने के लिए अभिभावक गण अपना समय तथा श्रम लगा रहे हैं। ऐसे में स्कूल को ट्यूशन फीस का भुगतान किस आधार पर किया जाए ,पहले अभिभावकों से अप्रैल से जून तक तीन माह का शुल्क मैसेज भेज भेज कर देने के लिए दबाव बनाया जा रहा था परंतु अब स्कूल प्रबंधन द्वारा अभिभावकों को फोन करके दबाव बनाया जा रहा है जो अभिभावकों के मानसिक और आर्थिक रुप से अधिकारों का हनन कर रहे हैं ,इस क्षेत्र के छोटे से छोटे स्कूल में गूगल मीट. जूम ऐप और अपने स्कूल के सॉफ्टवेयर के द्वारा बच्चों को पढ़ाया जा रहा है परंतु दून पब्लिक स्कूल भानियावाला में ऑनलाइन का माध्यम केवल व्हाट्सएप के माध्यम से फोटो भेजना है अभिभावकों के मन में यह है कि आजकल के प्रतिस्पर्धा के युग में कहीं बच्चा एक दूसरे से कहीं बिछड़ना जाएं और उनके मन में हीन भावना ना आ जाए
उपरोक्त सभी बातों से और ऑनलाइन की पढ़ाई से अभिभावक असंतुष्ट हैं तथा अभिभावकों के मन में स्कूल प्रबंधन के प्रति बड़ा रोष है और सभी इस बात में  एकमत हैं "नो स्कूल नो फीस जब तक स्कूल नहीं तब तक फीस नहीं
समाजसेवी योगेश राघव ने कहा कि उपरोक्त बातों का संज्ञान लेते हुए बाल सरक्षण आयोग को उचित कार्रवाई का निर्देश स्कूलों को देंना चाहिए जिससे इस संकट की घड़ी में अभिभावकों को कुछ राहत मिल सके और विद्यालय प्रबंधन अभिभावकों व बच्चों के शारीरिक मानसिक और आर्थिक हितों का हनन न कर सके ।
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